नाम.... (गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कवि मन का दर्दनाक उदगार) सियासत का स्याही न जाने क्यों इतना दागदार होता है, मिलता नहीं उसे हक जो सरल सज्जन, ईमानदार होता है, यहां चीलों के लिए लाशों का शिद्दत से ढेर सजाया जाता है, गुमनाम हो जाते हैं वीर शहीद जिसका मुल्क कर्जदार होता है। गली, सड़क, नगर चौराहे सभी पर लोगों ने नाम लिखवा लिया, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी पर भी अपना परचम लहरा दिया, भगत, राजगुरु, चंद्रशेखर, सुभाष का नाम यहां कहां मिलता है, देश की सारी योजनाओं के आगे किस किस का नाम लगा दिया,