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किस किस का नाम

नाम.... (गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कवि मन का दर्दनाक उदगार) सियासत का स्याही न जाने क्यों इतना दागदार होता है, मिलता नहीं उसे हक जो सरल सज्जन, ईमानदार होता है, यहां चीलों के लिए लाशों का शिद्दत से ढेर सजाया जाता है, गुमनाम हो जाते हैं वीर शहीद जिसका मुल्क कर्जदार होता है। गली, सड़क, नगर चौराहे सभी पर लोगों ने नाम लिखवा लिया, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी पर भी अपना परचम लहरा दिया, भगत, राजगुरु, चंद्रशेखर, सुभाष का नाम यहां कहां मिलता है, देश की सारी योजनाओं के आगे किस किस का नाम लगा दिया,

खुलता नहीं यहां कोई राज

बड़ी मुश्किल से आजाद हुआ हमारा हिन्दुस्तान, फिर सरकारी ऑफिस में भ्रष्टाचार ने डेरा डाला, जनता के सेवक भी होने लगे थोड़ा थोड़ा बेईमान, हद तो तब हुई,जब धरती का भगवान बना हैवान, बिन मतलब जांच पर जांच, आती नहीं जरा भी लाज, एमआर का टार्गेट पूरा करना जिनका पहला लक्ष्य,  भाड़ में जाए गरीब मरीज और मरीज का इलाज, सबकुछ लूटा कितने मर गए, खुलता नहीं यहां कोई राज

किस किस का नाम....

किस किस का नाम.... (गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कवि मन का दर्दनाक उदगार) सियासत का स्याही न जाने क्यों इतना दागदार होता है, मिलता नहीं उसे हक जो सरल सज्जन, ईमानदार होता है, यहां चीलों के लिए लाशों का ढेर शिद्दत से सजाया जाता है, गुमनाम हो जाते हैं वीर शहीद जिसका मुल्क कर्जदार होता है। गली, सड़क, नगर चौराहे सभी पर लोगों ने नाम लिखवा लिया, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी पर भी अपना परचम लहरा दिया, भगत, राजगुरु, चंद्रशेखर, सुभाष का नाम यहां कहां मिलता है, देश की सारी योजनाओं के आगे किस किस का नाम लिखवा दिया,

जुनून की ज्वाला...

जुनून की ज्वाला... --------------------------------------------- घनघोर अंधकार से जब घिरा हो मन, राहें सब ओझल, मझधार में हो जीवन, देवता हो कुपित, मुंह मोड़ ले परिजन, जीवन से निराश, विचलित हो अंतर्मन, ऐसे में बंधु तुम बिल्कुल मत घबराना, सारी दुनियां को थोड़ी देर भूल जाना, सिर्फ किताबों से तुम कर लेना याराना, समस्याएं सारी होंगी हल, इज्जत करेगा जमाना। अपेक्षाओं की बोझ से दब क्यों मर रहा है, क्या होगा कल, क्यों इतना डर रहा है, मत हो नर निराश, कर छोटा सा प्रयास, केंद्रित कर अपनी ऊर्जा, लिख नया इतिहास, आंख दिखाने वाले भी एक दिन आंख झुकाएंगे, था एक मेहनती आदमी, शौक से सबको बताएंगे, आओ करें प्रण, जुनून की ज्वाला है जलाना, चुनौतियों के समंदर में हमें खुद को है आजमाना...।

होशियारी

कभी दिल को बहलाता रहा, कभी दिमाग को झुठलाता रहा, जख्म जो वक्त ने दिया था, मुस्कुरा कर छिपाता रहा, लगा कर मुखौटा बहरूपिया वाला, मेरे घरौंदे में आग लगाता रहा, मैं गुस्ताखी करता रहा नजरंदाज, वह अपनी होशियारी पर इतराता रहा,

गांधीगिरी

गांधीगिरी सत्य अहिंसा का देकर नारा, जीवन भर वह अटल रहे, देश परदेश में सहा सितम, कब कहां वो विकल रहे, दुर्बल तन और निर्मल मन, संघर्षपथ पर सदा अविरल रहे, यातनाएं सही, पीड़ाएं झेला, चरखा चला, मचाते हलचल रहे, फिरंगियों के नाक में करके दम, देश आजाद कराने में सफल रहे, किया नहीं कभी पद की चाह, जीवनभर वह सरल रहे, सत्ता के हवसी लेकर उनका नाम, दुर्भाग्य, हर पल जनता को छल रहे, पूछता है, यह दुःसाहसी बिपिन, सही में गांधीगिरी पर कौन चल रहे...

डिजिटल दुनियां

डिजिटल दुनियां छह इंच की स्क्रीन ने मचाया ऐसा भयानक घमासान, फेसबुक पर हजारों दोस्त, पड़ोसी से रहता है अनजान, सोसल मीडिया की भीड़ में नई पीढ़ी है यहां हलकान, खुद की सोसाइटी में वही शख्स बना रहता है गुमनाम, किताबों ने कर ली आत्महत्या, पुस्तकालय सुनसान, पढ़ने की किसे फुरसत, वीडियो बनाने में सब परेशान, पढ़ने का लत क्यों छुटा, बुद्धिजीवियों में मचा घमासान, रायता फैला रहा निरंतर वॉट्स ऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान, एक छत के नीचे बैठे, फिर भी सबका स्क्रीन पर ध्यान, बड़े बुजुर्ग माथा पीटे, गजटो में घूट घूट जीता है इंसान, नई पीढ़ी डाटा खपाने में व्यस्त, भाड़ में जाए खानदान, हर घर की यही हालत, डिजिटल दुनियां से करे त्राहिमाम